मेरी नज़र में नवनीत शर्मा

अपने आस-पास, अपने माता-पिता, अपनी मिट्टी से गहरा लगाव, और उतना ही गहरा इस लगाव को अभिव्यक्त करने का हुनर है नवनीत शर्मा के पास। नवनीत का शिल्प अत्यंत प्रभावशाली है। नवनीत की कविताओं में जो धार है वही रवानगी इनकी ग़ज़लों में भी है। और कहने का अंदाज़ जैसा इनका है, किसी-किसी का होता है। मशहूर शायर साग़र ‘पालमपुरी’ के पुत्र होने के साथ- सुपरिचित ग़ज़लकार श्री द्विजेंद्र ‘द्विज’ के अनुज भी हैं नवनीत। इन दिनो नवनीत पत्रकारिता से जुड़े हैं लेकिन साहित्य से इनका लगाव आज भी बरकरार है। आपको नवनीत शर्मा की रचनाएं कैसी लगती हैं आप ज़रूर अपनी राय दें- प्रकाश बादल।

Monday, March 2, 2009

---हम अपना अम्बर ढूँढ रहे हैं

बेहतर दुनिया, अच्‍छी बातें, पागल शायर ढूँढ रहे हैं।
ज़हरीली बस्‍ती में यारो, हम अमृतसर ढूँढ रहे हैं।

ख़ालिस उल्‍फ़त,प्‍यार- महब्‍बत, ख़्वाब यक़ीं के हैं आंखों में,
दिल हज़रत के भी क्‍या कहने ! बीता मंज़र ढूँढ रहे हैं।

सीख ही लेंगे साबुत रहना अपनी आग में जल कर भी हम,
दर्द को किसने देखा पहले तो अपना सर ढूँढ रहे हैं।

ऐंठे जाते-जाते ही तो ख़त्म हुआ है आँख का पानी'
अब जब शहर ने पीकर छोड़ा सब अपना घर ढूँढ रहे हैं।

अपनी-अपनी जिनकी ज़रूरत, अपनी उनकी कोशिश भी है,
झूठे, ख़ंजर ढूंढ़ रहे हैं , सच वाले , दर ढूँढ रहे हैं

क्या जाने ये वक़्त किसे कब क्या मंज़र दिखला देता है,
बावड़ियों को पीने वाले मिनरल वाटर ढूँढ रहे हैं।

याद तुम्हें जब करता हूँ तो समझाते हैं मुझको पर्वत,
‘सदियों से सब सह कर भी हम अपना अंबर ढूँढ रहे हैं’

8 comments:

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत सुन्दर शब्दों में पिरोई रचना . धन्यवाद.

योगेन्द्र मौदगिल said...

पूरी ग़ज़ल बेहतरीन है नवनीत जी वाह....

सतपाल said...

bahut sundar navneet bhai.
क्या जाने ये वक़्त किसे कब क्या मंज़र दिखला देता है,
बावड़ियों को पीने वाले मिनरल वाटर ढूँढ रहे हैं।

याद तुम्हें जब करता हूँ तो समझाते हैं मुझको पर्वत,
‘सदियों से सब सह कर भी हम अपना अंबर ढूँढ रहे हैं’
behatreen ghazal.

नीरज गोस्वामी said...

प्रकाश जी आप इतना बेहतरीन काम कर हैं, नवनीत जी की रचनाएँ पढ़वा कर की शब्दों में क्या बयां करूँ....मेरी नज़र में वो एक बेहद खूबसूरत कलाम कहने वाले शायर हैं...शेरों में ग़ज़ब की ताजगी नज़र आती है...अब इस शेर को देखें...हाथ खुद बा खुद तालियाँ पीटने को मजबूर हो जाते हैं...:

क्या जाने ये वक़्त किसे कब क्या मंज़र दिखला देता है,
बावड़ियों को पीने वाले मिनरल वाटर ढूँढ रहे हैं।

नीरज

रंजना said...

भाव और शब्दों के जादूगरी की तो क्या कहूँ,इसकी रवानगी/प्रवाहमयता ने गुनगुनाने पर मजबूर कर दिया..

अद्भुद अद्भुद !!! बहुत ही सुन्दर !!

प्रकाशित करने के लिए साधुवाद..

navneet sharma said...

Ranjna ji, Neeraj Bhai, Satpal Bhai, yogender ji aur Mahender ji, aap sab ne hausla badhayaa, abhaari hun. Bhai Badal ka bhi jinke karan itna pyar barsa.

गौतम राजरिशी said...

अद्‍भुत गज़ल नवनीत जी...क्या बात है "बावड़ियों को पीने वाले मिनरल वाटर ढूँढ रहे हैं"

और आखिरी शेर तो बस कयामत है

"अर्श" said...

नवनीत जी के शे'र कहने के अंदाज के क्या कहने...एक रवानी से बहती है ... प्रकाश जी बढ़िया और ताजगी भरी शे'र पढ़वाने के लिए आपका आभार....


अर्श