मेरी नज़र में नवनीत शर्मा
Friday, February 6, 2009
तुम्हारे शहर की बस
ड्राइवर के माथे पर
पहुँचने की खुशी
थके हुए इंजन की आवाज
धूल से आंख मलते
खिड़कियों के शीशे
सबने यही कहा
दूर बहुत ही दूर है तुम्हारा शहर
यह बस देखती है
तुम्हारे शहर का सवेरा
मेरे गाँव की साँझ
सवाल पूछता है मन
क्या तुम्हारा शहर भी उदास होता है
जब कभी पहुँचती है
मेरे गाँव का सवेरा लेकर
तुम्हारे शहर की शाम में कोई बस
थकी-माँदी।
(भाई सतपाल ख़्याल के आग्रह पर यह कविता यहाँ प्रस्तुत की जा रही है। यह कविता यूँ भी नवनीत शर्मा की बेहतरीन कविताओं में एक है। कई वर्ष पहले लिखी यह कविता आज भी कितनी ताज़ा है, आप पढ़कर ख़ुद ही अंदाज़ा लगाईए : प्रकाश बादल)
Thursday, January 22, 2009
ऐसे ख़्याल और ऐसा शब्दकोष अगर किसी के पास हो तो फिर भला कोई किसी का कायल क्यों न हो। नवनीत भाई की ये ग़ज़ल ऐसा ही साबित कर रही है। वाह! नवनीत भाई वाह। ज़ाहिर हैं पाठक मेरे विचारों से सहमत (प्रकाश बादल)
चाय की दुकानें भी शराबों के लिए है
ग़ज़ल
ख्वाबों के लिए हैं न किताबों के लिए हैं
हम रोज-ए-अज़ल से ही अज़ाबों के लिए हैं
चलते भी रहें और मंज़िल नज़र आए
हम अपने ही अंदर के सराबों के लिए हैं
संसद में डटे लोग सवालों के लिए हैं
खेतों में जुटे लोग जवाबों के लिए हैं
बाज़ार ने तहज़ीब को निगला है कुछ ऐसे
चाय की दुकानें भी शराबों के लिए हैं
क्या जाने कहाँ कौन सी सूरत नज़र आए
इस दिल के कई चेहरे नकाबों के लिए हैं
खुशबू ही कहाँ ज़िक्र भी गुम हो गया तेरा
सब याद के पिंजर तो उकाबों के लिए हैं
अब आ गया रास हमको भी सन्नाटे में जीना
हम याद के वीरान खराबों के लिए हैं।
रोज़-ए-अज़ल : पहला दिन, अज़ाब : परेशानी, सराब : रेगिस्तान, खराब : खंडहर
Tuesday, January 13, 2009
ग़ज़ल
हौसले सब ज़मीन हो जाएँ।
ख़्वाब कुछ बेहतरीन हो जाएँ,
सच अगर बदतरीन हो जाएँ।
ना—नुकर की वो संकरी गलियाँ,
हम कहाँ तक महीन हो जाएँ।
ख़ुद से कटते हैं और मरते हैं,
लोग जब भी मशीन हो जाएँ।
आपको आप ही उठाएँगे,
चाहे वृश्चिक या मीन हो जाएँ।
Sunday, January 4, 2009
पिता जी - शब्दांजलि
घरों में बलगती छाती का होना
दीवारों का चौकस
छत का मजबूत होना है।
वही झेलती है
तीरों की धूप
कुरलाणियों की बरखा ।
दुख बस यही कि खिड़कियां
बहुत जल्द आसमान
हो जाना चाहती हैं।
2
वक्त की चोट से हिले हैं कब्जे
खिड़कियों के
खुली हवा का चाव पूरा हो गया
घर मगर कितना अधूरा हो गया
अब छत नहीं मिलती
शब्द जहां उतार देते थे रोगन
भाव भी
वह बिस्तर खाली है।
3
खूब लड़ी वह जेब
सरसों के तेल की धार से
कोयले की बोरी ले कर
लड़ते रहे वे हाथ
जाड़ों से ।
पिता सोए
बड़के की फीस के हिज्जे गुनते
मंझले की मंजिल पर
नींद में बुड़बुड़ाते
और सुबह से भी पहले जाग उठते
छोटा अभी बहुत ही छोटा है
बड़ा होगा न जाने कब
4
डायरियों पर आकृतियां बनाते हैं बच्चे
पहनते हैं दादा की ऐनक
जिससे दिखते थे
उर्दू के कुछ मीठे शब्द
बच्चों को आरता है चक्कर
शीशम के बने टेबल लैंप से खलते हैं जगाना-बुझाना
छुटकी के बस्ते में पड़े हैं चायनीज पैन के टुकड़े
अब रोकता नहीं कोई
अब टोकता नहीं कोई
5
पिता
उसकी जेब में पड़ी कलम
के कारण विनम्र हो गए हैं उसके शब्द
खत्म होने को डराते
चावल के पेड़ू ने कर दिया है उसे
सावधान
उदासियों में
बदहवासियों मेंवह सीख गया है बनना
अपना बाप
अपने आप
6
कितने ही साल से खामोश है
चिटिठयों पर
पुतने वाली गोंद
कोई नहीं पूछता
कविता का मिजाज
पिछवाड़े पड़ा बालन
उसकी खपचियां
भूल गई हैं ड्रिफ्टवुड से अपना रिश्ता
कोई नहीं कहता
हरियाली से बचना
फूल की तारीफ के बाद
नहीं रुकना फूल के पास
नहाते हुए लगाना नाभी पर तेल
Wednesday, December 24, 2008
हरतरफ तू है
जैसे सौदाई को बेवजह सुकूं मिलता है
मैं भटकता था बियाबान में साये की तरह
अपनी नाकामी-ए-ख्वासहिश पे पशेमां होकर
फर्ज़ के गांव में जज़्बात का मकां होकर
पर अचानक मुझे तुमने जो पुकारा तो लगा
कौन ईसा है जिसे मेरी दवा याद रही
वो मुझे छू ले, समझ ले वो मेरे पास आए
कांपते होंठों पे बस एक ही फरियाद रही
दिल की उधड़ी हुई सीवन को छूआ यूं तुमने
कुछ भी ताज़ा न था पर फिर भी कहा यूं तुमने
रूह की आंख ने कई लम्हाथ खुशी रोई है
तुमने अपनाई से छूकर जो टटोला है मुझे
बर्फ़ के शहर में कुछ आस के सूरज की तरह
बरस रहा हूं मुसलसल मैं खुद पे बादल सा
दिख रहा है तू फरिश्ता सा एक हंसता हुआ
मैंने आंखें में तेरी होने का सामां देखा
और चेहरे से तेरे होने की खुशबू पाई
मैंने जज़्बात में देखी है तेरी लौ जिसमें
मुझसी वीरां कोई वादी भी जगमगाई है
और मैं ज़ेहन की तारीकियों को यूं डपटूं
काहिली दूर हो अब मैं भी ज़रा सा हंस लूं
हटो उदासियों आंगन में बहार आई है
आज जज़्बात पे हावी है ये लम्हात का दर्द
ग़म के संदेशों का दुख, दिल के हालात का दर्द
अब तेरी याद भी आती है तो याद आने पे
दिल भड़क जाता है कुछ और भी समझाने पे
अब तेरी राह से रिश्ता नहीं कोई बाकी
नमी न कोई कर सके इसे कभी ठंडा
अब तेरी याद को आंखो में छुपा रखा है
हम नहीं ज़ख्म जो हर रोज दर्द सह जाएं
सोचता मैं भी हूं दफना दूं ये बोझल चेहरा
सिर उठाउं जो कि सजदे में झुका रहता है
लड़ें, लड़ें तो लड़ें पर ख़्यालात आता है
तू है खुद अपने मुकाबिल लड़े तो किससे लड़े
मेरे निशाने पे मैं हूं भिड़ूं तो किससे भिड़ूं
हर तरफ तू है मैं बचता भी हूं तो किससे बचूं
बुझा-बुझा सा ये दिल सुबह शाम करता है
सुस्तफ कदमों से कोई सूरज को दफ्न करता है
कोई हवा जो बहुत रहमदिल हो ये सुन ले
पहाड़ अब भी समंदर को याद करता है
इस जनम में तो है रिश्तार यही तेरा मेरा
इंतजार और करें अगले जनम तक आओ।
Friday, December 19, 2008
रूमाल
सफ़ेद रूमाल के कोने पर
अंग्रेजी में बुने गए हैं अक्षर
शक भी नहीं होता कि
उसे धुंधलाएगी
समय की धूल
चिढ़ाएंगी सफ़ेदी में दुबकी शर्तें
रूमाल अब कुछ नहीं कहते
गैस स्टोव साफ़ करते-करते
घिसने से बच जाते हैं शब्द के जो हिस्से
वे कुछ सालों बाद लोकगीतों में मिलते हैं।
2.
पति के घर लौटने से पहले
बच्चों को बहला-फुसला कर
चिट्ठियों के महीन-मुलायम
ख़ुशबूदार काग़ज़ों का बंडल
कूड़ेदान में फेंक कर आई माँ
बहुत उदास है।
3.
डूब रहे हैं स्वेटर बुनते दिल
सिलाइयों पर निगाहों की ज़ंग
और गहरा गई है
स्कूली जमातन के
ससुराली गाँव की ढाँक
जेब में अपनी माचिस का सपना पाले
घिस रहे शहर में पैर
अब समझे हैं
कैसे बन जाती है रूमालों की पोंछन
महीन कागजों की कुल्हाडि़याँ
4.
दरख़्त कट गए
तुम चुप रहे
छतों से झाँकने लगा आकाश
तुम सहज थे
पानी जुराबों से होता
टखनों तक पसर गया
तुम कुछ नहीं बोले
तुम्हें रूमाल का आसरा था
क्यों इतना भी नहीं सोचते
रूमाल अब आँखें नहीं पोंछते।
Tuesday, December 16, 2008
नवनीत शर्मा की दो ग़ज़लें
अब पसर आए हैं रिश्तों पे कुहासे कितने।
अब जो ग़ुर्बत में है नानी तो नवासे कितने।
चोट खाए हुए लम्हों का सितम है कि उसे,
रूह के चेहरे पे दिखते हैं मुहाँसे कितने।
सच के क़स्बे पे मियाँ झूठ की है सरदारी,
अब अटकते हैं लबों पर ही ख़ुलासे कितने।
थे बहुत ख़ास जो सर तान के चलते थे यहाँ,
अब इसी शहर में वाक़िफ़ हैं अना से कितने।
अब भी अंदर है कोई शय जो धड़कती है मियाँ,
वरना बाज़ार में बिकते हैं दिलासे कितने।
2
मुझे उम्मीद थी भेजोगे नग़्मगी फिर से।
तुम्हारे शहर से लौटी है ख़ामुशी फिर से।
यहाँ दरख़्तों के सीने पे नाम खुदते हैं।
मगर है दूर वो दस्तूर-ए-बंदगी फिर से।
गड़ी है ज़िन्दगी दिल में कँटीली यादों-सी।
ज़रा निजात मिले, तो हो ज़िंदगी फिर से।
बची जो नफ़रतों की तेज़ धूप से यारो,
ये शाख़ देखना हो जाएगी हरी फिर से।
सनम तो हो गया तब्दील एक पत्थर में,
मेरे नसीब में आई है बंदगी फिर से।
मुझे भुलाने चले थे वो भूल बैठे हैं,
उन्हीं के दर पे मैं पत्थर हूँ दायमी फिर से।