मेरी नज़र में नवनीत शर्मा

अपने आस-पास, अपने माता-पिता, अपनी मिट्टी से गहरा लगाव, और उतना ही गहरा इस लगाव को अभिव्यक्त करने का हुनर है नवनीत शर्मा के पास। नवनीत का शिल्प अत्यंत प्रभावशाली है। नवनीत की कविताओं में जो धार है वही रवानगी इनकी ग़ज़लों में भी है। और कहने का अंदाज़ जैसा इनका है, किसी-किसी का होता है। मशहूर शायर साग़र ‘पालमपुरी’ के पुत्र होने के साथ- सुपरिचित ग़ज़लकार श्री द्विजेंद्र ‘द्विज’ के अनुज भी हैं नवनीत। इन दिनो नवनीत पत्रकारिता से जुड़े हैं लेकिन साहित्य से इनका लगाव आज भी बरकरार है। आपको नवनीत शर्मा की रचनाएं कैसी लगती हैं आप ज़रूर अपनी राय दें- प्रकाश बादल।

Sunday, February 3, 2013

तीन नई कविताएँ

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अंबर जब कविता लिखता है
हर तबका नहीं सुनता
जब कविता लिखता है अंबर
पर सुनती हैं कच्‍चे घरों की स्‍लेटपोश छतें
सर्द मौसम में अंबर की भीगी हुई कविता
और मिलाती हैं सुर/
सुनते हैं इसे
फुटपाथ पर कंबल में लिपटे जिस्‍म
दांत किटकिटाते
और कुछ ऐसा कहते हुए
जो भाषा के लायक नहीं होता
अजेय भाई के केलांग के किसी गांव में
जब बर्फ लिख रहा होता है अंबर
तो उसे सुन ही नहीं, जी रहा होता है
उड़ान के इंतजार में कोई मरीज
अंबर की कविता भी अंबर जैसी
खत्‍म होने पर भी रहता है असर।
एक असर यह भी
कि करते हैं दुआ कबायली
सर्दियों में सेब के पौधे में क्‍यों तबदील नहीं हो जाता आदमी
जिंदगी ही दें भरपूर 'चिलिंग आवर'
अंबर जब कविता लिखता है
मनाली बस की किसी सीट पर
कंबल ओढ़
जज्‍बों में डूबा रहता है कोई हनीमून कपल
सब सुनते हैं अंबर की कविता
सबका अपना है अनुभव
कोई अच्‍छी तो कोई बुरी कहता है
लेकिन एक तबका है ऐसा अभागा
जिस तक नहीं पहुंचती अंबर की कविता
उसकी
कारों के दरवाजे
कंकरीट की छतें
लैपटॉप की स्‍क्रीन
और एयरकंडीशंड कमरे
सब मिल कर उससे छीन लेते हैं
वही,
अंबर की कविता।

 ************2****************
जब तक रहेंगे पेड़

दाना चुगने में थकी चिडि़या
आती रहेगी
अपनी चोंच से छोटे-छोटे मुंहों में
जीवन धर कर लौटती रहेगी
परवाज पर
तने सहते रहेंगे चाकुओं से
उन पर उकेरे जाते प्रेमियों के नाम का दर्द
हवाओं के तेवरों के मुताबिक
चोटियां हिलती रहेंगी
हर मौसम में
शाखों पर आते रहेंगे फूल
शाम को लंबी सुनहरी अंगुलियों से
पेड़ों का सिर सहला कर
लौटती रहेगी धूप
बांधते रहेंगे कुछ लोग पेड़ों को धागे
सब कुछ करते रहेंगे पेड़
यह जानते हुए भी कि
उन्‍हें घूर रही हैं कुछ कुल्‍हाडि़यां
पेड़ जानता है सड़क को जब सीधे होना होता है
उसकी नजरें टेढ़ी हो जाती हैं
फिर भी सब कुछ करते रहेंगे
जब रहेंगे पेड़
मगर कौन बताए
कब तक रहेंगे पेड़


************3****************
ढूंढ़ना मुझे

ढूंढ़ना मुझे
बावड़ी के किनारे रखे पत्‍थरों के नीचे
पीपल को बांधी गई डोर से कुछ दूर
खिलते गेंदे की कली में
झरने से फूटते पानी के ठीक पीछे
या उस कांटेदार पौधे में जिसका दूध
हाथों-पैरों के मस्‍से ठीक करता है
ढूंढ़ना मुझे
पहाड़ी पर खड़े हो कर गाए
किसी गीत के बोल के अंतिम हिस्‍से में
मैं मिलूंगा तुम्‍हें
अधूरे छूटे किसी लोकगीत की संभावना में
जंतर मंतर पर भी रहूंगा मैं
उन गुहारों में जो कुछ बदलना चाहती हैं
मुझे पाना उन चीखों में
जो बहुत बार अनसुनी रह जाती हैं
किसी संकरे पुल पर
पार से किसी के इंतजार में
शांत बैठा दिख सकूंगा मैं
जरूरी हो तो मुझे खोजना
पहाड़ काटने में मसरूफ
किसी जेसीबी के ब्‍लेड को टेढ़ा कर चुके पत्‍थर में
जो इस बार नहीं है कहीं
बस उसी सबके आसपास देखना मुझे।

Sunday, October 4, 2009

..हर मकां भी तो घर नहीं होता

यह जो बस्ती में डर नहीं होता
सबका सजदे में सर नहीं होता

तेरे दिल में अगर नहीं होता
मैं भी तेरी डगर नहीं होता

रेत के घर पहाड़ की दस्तक
वाक़िया ये ख़बर नही होता

ख़ुदपरस्ती ये आदतों का लिहाफ़
ख़्वाब तो हैं गजर नहीं होता

मंज़िलें जिनको रोक लेती हैं
उनका कोई सफ़र नहीं होता

पूछ उससे उड़ान का मतलब
जिस परिंदे का पर नहीं होता

आरज़ू घर की पालिए लेकिन
हर मकाँ भी तो घर नहीं होता

तू मिला है मगर तू ग़ायब है
ऐसा होना बसर नहीं होता

इत्तिफ़ाक़न जो शे`र हो आया
क्या न होता अगर नहीं होता.

Wednesday, May 20, 2009

तुम उधर मत जाना


पिछले दिनों हिमाचल प्रदेश के टांडा मैडिकल कॉलेज में 19 वर्षीय एमबीबीस करने आए छात्र अमनकाचरू को रैगिंग के दानव ने लील दिया उसी विचलित करने वाली दुर्घटना के बाद लिखी गई नवनीत भाई की यह कविता!


अमन काचरू 
(क्षमायाचना के साथ अमन काचरू के लिए)
राजधानी के अपराध आंकड़ों को छोड़
जब चला एक शांत कस्‍बे के लिए

निश्चिंत था मैं।
ठंडी हवाओं ने बताया
यहां सुकुन है,
यहां के लोगों में है कुछ ऐसा कि
देवता का जिक्र आता ही है।
यहां वातावरण में गूंजती है
इनसान को मौत के मुंह से खींच लाने की कसम
भगवान तैयार हो रहे हैं यहां
ग्रामीण चाय की दुकानों पर बतियाते हैं।
लेकिन धूपभरी एक दोपहर
मुझे बताया एक बरगद ने
कि यह जो बस्‍ती है
वहां दिन रात से उतना ही अलग है
जितनी रात होती है अलग दिन से ।
दिन में भयावह दिख़ने वाली खड्डें
रात को तब रहमदिल बिस्‍तर बन जाती हैं
जब यह भगवान बनाने वाली इमारत राक्षसों के अटहास से
गूंजने लगती है।
दिन के जितने हैं मासूम चेहरे
रात को उनके दो दांत बाहर आ जाते हैं
वे डराते हैं, धमकाते हैं,नोचते हैं और लूटते हैं
मुझे नहीं था यकीन
कि मां चामुंडा से मिल कर आती
बनेर खड़ड एक रात मेरा बिस्‍तर बन जाएगी
जब मैने देवताओं को राक्षस बनते देखा था।
मैंने मदद के लिए आवाज लगाई
पर किसी ने मेरे मुंह पर
प्राचार्य दफ्तर का पेपरवेट उठा कर दे मारा
मेरी जीभ छिल गई
मैं चुप हो गया।
मेरे बाजू अभी सलामत थे
मैने दूर देखा 'राघवन कमेटी' की सिफारिश
धौलाधार की चोटी पर चमक रही है
मैने हाथ बढ़ाया
लेकिन इससे पहले ही चार हंसते हुए चेहरों ने
उसे फाड़ कर फेंक दिया।
मैने सोए हुए चौकीदार को जगाया
लेकिन उसके खर्राटों ने बताया
मेरा वार्डन भी सोया हुआ है।
मैंने कागजों से कहा अपना दुख
आकृत्तियां बनाईं,
लिखा, उकेरा
सब कुछ कि मैं कितना बोझ उठाकर कर घिसट रहा हूं।
किसी ने मुझे नहीं देखा
कुछ वर्दियां चमकती रही
कुछ हूटर बजते रहे
जूनियरों के सिर मुंडते रहे
वे नमस्‍ते की मुद्रा में चलते रहे
कुछ लैब कोट खून से सनते रहे।

पर उस रात तो हद ही हो गई
उस रात मेरे सपने तोड़े गए
उस रात मेरा सिर फोड़ा गया
उस रात मुझे पूरे का पूरा तोड़ा गया
और अब मैं कहीं नहीं हूं।

तुम देखो कि
मैं अपने शहर में क्राइम का शिकार नहीं हुआ
मुझे दिल्‍ली की ब्‍लू लाइन ने नहीं रौंदा
मुझे गुड़गांव पुलिस ने फर्जी एनकाउंटर में नहीं सुलाया
यह जो घर तुम्‍हारा है
मुझे यहां हरियाली ने मारा है
सुनो,
तुम उधर मत जाना।

गांव में हल चला लेना
आटर्स पढ़ लेना
मां-बाप के सपने तोड़ देना
नालायक ही रह जाना
दुकानदारी चला लेना
कुछ भी करना पर
यूं मत मरना
यह मरना नहीं
मारा जाना है।
क्‍योकि मैं भी नहीं चाहता था मरना

यह सब मुझे अमन काचरू ने बताया
जब जाने के कई दिन बाद तक
वह मुझसे बतियाया।

Wednesday, March 25, 2009

....खुश्बुओं का डेरा है।

उनका जो ख़ुश्बुओं का डेरा है।

हाँ, वही ज़ह्र का बसेरा है।


सच के क़स्बे का जो अँधेरा है,

झूठ के शहर का सवेरा है।


मैं सिकंदर हूँ एक वक़्फ़े का,

तू मुक़द्दर है वक्त तेरा है।


दूर होकर भी पास है कितना,

जिसकी पलकों में अश्क मेरा है।


जो तुझे तुझ से छीनने आया,

यार मेरा रक़ीब तेरा है।


मैं चमकता हूँ उसके चेहरे पर,

चाँद पर दाग़ का बसेरा है।

Tuesday, March 17, 2009

ख़्वाब कुछ बेहतरीन......

वहम जब भी यक़ीन हो जाएँ |

हौसले सब ज़मीन हो जाएँ ||


ख़्वाब कुछ बेहतरीन हो जाएँ,

सच अगर बदतरीन हो जाएँ |


ना—नुकर की वो संकरी गलियाँ,

हम कहाँ तक महीन हो जाएँ |


ख़ुद से कटते हैं और मरते हैं,

लोग जब भी मशीन हो जाएँ |


आपको आप ही उठाएँगे,

चाहे वृश्चिक या मीन हो जाएँ |

Monday, March 2, 2009

---हम अपना अम्बर ढूँढ रहे हैं

बेहतर दुनिया, अच्‍छी बातें, पागल शायर ढूँढ रहे हैं।
ज़हरीली बस्‍ती में यारो, हम अमृतसर ढूँढ रहे हैं।

ख़ालिस उल्‍फ़त,प्‍यार- महब्‍बत, ख़्वाब यक़ीं के हैं आंखों में,
दिल हज़रत के भी क्‍या कहने ! बीता मंज़र ढूँढ रहे हैं।

सीख ही लेंगे साबुत रहना अपनी आग में जल कर भी हम,
दर्द को किसने देखा पहले तो अपना सर ढूँढ रहे हैं।

ऐंठे जाते-जाते ही तो ख़त्म हुआ है आँख का पानी'
अब जब शहर ने पीकर छोड़ा सब अपना घर ढूँढ रहे हैं।

अपनी-अपनी जिनकी ज़रूरत, अपनी उनकी कोशिश भी है,
झूठे, ख़ंजर ढूंढ़ रहे हैं , सच वाले , दर ढूँढ रहे हैं

क्या जाने ये वक़्त किसे कब क्या मंज़र दिखला देता है,
बावड़ियों को पीने वाले मिनरल वाटर ढूँढ रहे हैं।

याद तुम्हें जब करता हूँ तो समझाते हैं मुझको पर्वत,
‘सदियों से सब सह कर भी हम अपना अंबर ढूँढ रहे हैं’

Friday, February 6, 2009

तुम्‍हारे शहर की बस

यह बस तुम्‍हारे शहर से आई है

ड्राइवर के माथे पर

पहुँचने की खुशी

थके हुए इंजन की आवाज

धूल से आंख मलते

खिड़कियों के शीशे

सबने यही कहा

दूर बहुत ही दूर है तुम्‍हारा शहर

यह बस देखती है

तुम्‍हारे शहर का सवेरा

मेरे गाँव की साँझ

सवाल पूछता है मन

क्‍या तुम्‍हारा शहर भी उदास होता है

जब कभी पहुँचती है

मेरे गाँव का सवेरा लेकर

तुम्‍हारे शहर की शाम में कोई बस

थकी-माँदी।

(भाई सतपाल ख़्याल के आग्रह पर यह कविता यहाँ प्रस्तुत की जा रही है। यह कविता यूँ भी नवनीत शर्मा की बेहतरीन कविताओं में एक है। कई वर्ष पहले लिखी यह कविता आज भी कितनी ताज़ा है, आप पढ़कर ख़ुद ही अंदाज़ा लगाईए : प्रकाश बादल)

Thursday, January 22, 2009

ऐसे ख़्याल और ऐसा शब्दकोष अगर किसी के पास हो तो फिर भला कोई किसी का कायल क्यों न हो। नवनीत भाई की ये ग़ज़ल ऐसा ही साबित कर रही है। वाह! नवनीत भाई वाह। ज़ाहिर हैं पाठक मेरे विचारों से सहमत (प्रकाश बादल)


चाय की दुकानें भी शराबों के लिए है

ग़ज़ल


ख्वाबों के लिए हैं न किताबों के लिए हैं

हम रोज-ए-अज़ल से ही अज़ाबों के लिए हैं


चलते भी रहें और मंज़िल नज़र आए

हम अपने ही अंदर के सराबों के लिए हैं


संसद में डटे लोग सवालों के लिए हैं

खेतों में जुटे लोग जवाबों के लिए हैं


बाज़ार ने तहज़ीब को निगला है कुछ ऐसे

चाय की दुकानें भी शराबों के लिए हैं


क्या जाने कहाँ कौन सी सूरत नज़र आए

इस दिल के कई चेहरे नकाबों के लिए हैं


खुशबू ही कहाँ ज़िक्र भी गुम हो गया तेरा

सब याद के पिंजर तो उकाबों के लिए हैं


अब आ गया रास हमको भी सन्नाटे में जीना

हम याद के वीरान खराबों के लिए हैं।

रोज़-ए-अज़ल : पहला दिन, अज़ाब : परेशानी, सराब : रेगिस्तान, खराब : खंडहर

Tuesday, January 13, 2009

ग़ज़ल

वहम जब भी यक़ीन हो जाएँ।

हौसले सब ज़मीन हो जाएँ।


ख़्वाब कुछ बेहतरीन हो जाएँ,

सच अगर बदतरीन हो जाएँ।


ना—नुकर की वो संकरी गलियाँ,

हम कहाँ तक महीन हो जाएँ।


ख़ुद से कटते हैं और मरते हैं,

लोग जब भी मशीन हो जाएँ।


आपको आप ही उठाएँगे,

चाहे वृश्चिक या मीन हो जाएँ।

Sunday, January 4, 2009

पिता जी - शब्दांजलि

1

घरों में बलगती छाती का होना

दीवारों का चौकस

छत का मजबूत होना है।

वही झेलती है

तीरों की धूप

कुरलाणियों की बरखा ।


दुख बस यही कि खिड़कियां

बहुत जल्‍द आसमान

हो जाना चाहती हैं।

2

वक्‍त की चोट से हिले हैं कब्‍जे

खिड़कियों के

खुली हवा का चाव पूरा हो गया

घर मगर कितना अधूरा हो गया

अब छत नहीं मिलती

शब्‍द जहां उतार देते थे रोगन

भाव भी

वह बिस्‍तर खाली है।


3

खूब लड़ी वह जेब

सरसों के तेल की धार से

कोयले की बोरी ले कर

लड़ते रहे वे हाथ

जाड़ों से ।

पिता सोए

बड़के की फीस के हिज्‍जे गुनते

मंझले की मंजिल पर

नींद में बुड़बुड़ाते

और सुबह से भी पहले जाग उठते

छोटा अभी बहुत ही छोटा है

बड़ा होगा न जाने कब

4

डायरियों पर आकृतियां बनाते हैं बच्‍चे

पहनते हैं दादा की ऐनक

जिससे दिखते थे

उर्दू के कुछ मीठे शब्‍द

बच्‍चों को आरता है चक्‍कर

शीशम के बने टेबल लैंप से खलते हैं जगाना-बुझाना

छुटकी के बस्‍ते में पड़े हैं चायनीज पैन के टुकड़े

अब रोकता नहीं कोई

अब टोकता नहीं कोई

5

पिता

उसकी जेब में पड़ी कलम

के कारण विनम्र हो गए हैं उसके शब्‍द

खत्‍म होने को डराते

चावल के पेड़ू ने कर दिया है उसे

सावधान

उदासियों में

बदहवासियों मेंवह सीख गया है बनना

अपना बाप

अपने आप

6

कितने ही साल से खामोश है

चिटिठयों पर

पुतने वाली गोंद

कोई नहीं पूछता

कविता का मिजाज

पिछवाड़े पड़ा बालन

उसकी खपचियां

भूल गई हैं ड्रिफ्टवुड से अपना रिश्‍ता

कोई नहीं कहता

हरियाली से बचना

फूल की तारीफ के बाद

नहीं रुकना फूल के पास

नहाते हुए लगाना नाभी पर तेल

Wednesday, December 24, 2008

हरतरफ तू है

एक शेर की पंक्ति 'इंतज़ार और करो अगले जनम तक मेरा', को सुन कर कही गई नज़्म एक मुस्लसल नज़्म

जैसे सौदाई को बेवजह सुकूं मिलता है

मैं भटकता था बियाबान में साये की तरह

अपनी नाकामी-ए-ख्वासहिश पे पशेमां होकर

फर्ज़ के गांव में जज़्बात का मकां होकर

पर अचानक मुझे तुमने जो पुकारा तो लगा

कौन ईसा है जिसे मेरी दवा याद रही

वो मुझे छू ले, समझ ले वो मेरे पास आए

कांपते होंठों पे बस एक ही फरियाद रही


दिल की उधड़ी हुई सीवन को छूआ यूं तुमने

कुछ भी ताज़ा न था पर फिर भी कहा यूं तुमने

रूह की आंख ने कई लम्हाथ खुशी रोई है

तुमने अपनाई से छूकर जो टटोला है मुझे

बर्फ़ के शहर में कुछ आस के सूरज की तरह

बरस रहा हूं मुसलसल मैं खुद पे बादल सा

दिख रहा है तू फरिश्ता सा एक हंसता हुआ


मैंने आंखें में तेरी होने का सामां देखा

और चेहरे से तेरे होने की खुशबू पाई

मैंने जज़्बात में देखी है तेरी लौ जिसमें

मुझसी वीरां कोई वादी भी जगमगाई है

और मैं ज़ेहन की तारीकियों को यूं डपटूं

काहिली दूर हो अब मैं भी ज़रा सा हंस लूं

हटो उदासियों आंगन में बहार आई है

आज जज़्बात पे हावी है ये लम्हात का दर्द

ग़म के संदेशों का दुख, दिल के हालात का दर्द

अब तेरी याद भी आती है तो याद आने पे

दिल भड़क जाता है कुछ और भी समझाने पे

अब तेरी राह से रिश्ता नहीं कोई बाकी

नमी न कोई कर सके इसे कभी ठंडा

अब तेरी याद को आंखो में छुपा रखा है


हम नहीं ज़ख्म जो हर रोज दर्द सह जाएं

सोचता मैं भी हूं दफना दूं ये बोझल चेहरा

सिर उठाउं जो कि सजदे में झुका रहता है

लड़ें, लड़ें तो लड़ें पर ख़्यालात आता है

तू है खुद अपने मुकाबिल लड़े तो किससे लड़े

मेरे निशाने पे मैं हूं भिड़ूं तो किससे भिड़ूं

हर तरफ तू है मैं बचता भी हूं तो किससे बचूं


बुझा-बुझा सा ये दिल सुबह शाम करता है

सुस्तफ कदमों से कोई सूरज को दफ्न करता है

कोई हवा जो बहुत रहमदिल हो ये सुन ले

पहाड़ अब भी समंदर को याद करता है

इस जनम में तो है रिश्तार यही तेरा मेरा

इंतजार और करें अगले जनम तक आओ।






Friday, December 19, 2008

रूमाल

1.
सफ़ेद रूमाल के कोने पर
अंग्रेजी में बुने गए हैं अक्षर
शक भी नहीं होता कि
उसे धुंधलाएगी
समय की धूल
चिढ़ाएंगी सफ़ेदी में दुबकी शर्तें
रूमाल अब कुछ नहीं कहते
गैस स्‍टोव साफ़ करते-करते
घिसने से बच जाते हैं शब्‍द के जो हिस्‍से
वे कुछ सालों बाद लोकगीतों में मिलते हैं।

2.

पति के घर लौटने से पहले
बच्‍चों को बहला-फुसला कर
चिट्ठियों के महीन-मुलायम
ख़ुशबूदार काग़ज़ों का बंडल
कूड़ेदान में फेंक कर आई माँ
बहुत उदास है।

3.

डूब रहे हैं स्‍वेटर बुनते दिल
सिलाइयों पर निगाहों की ज़ंग
और गहरा गई है
स्‍कूली जमातन के
ससुराली गाँव की ढाँक
जेब में अपनी माचिस का सपना पाले
घिस रहे शहर में पैर
अब समझे हैं
कैसे बन जाती है रूमालों की पोंछन
महीन कागजों की कुल्‍हाडि़याँ

4.

दरख़्त कट गए
तुम चुप रहे
छतों से झाँकने लगा आकाश
तुम सहज थे
पानी जुराबों से होता
टखनों तक पसर गया
तुम कुछ नहीं बोले
तुम्‍हें रूमाल का आसरा था
क्‍यों इतना भी नहीं सोचते
रूमाल अब आँखें नहीं पोंछते।

Tuesday, December 16, 2008

नवनीत शर्मा की दो ग़ज़लें

1

अब पसर आए हैं रिश्तों पे कुहासे कितने।

अब जो ग़ुर्बत में है नानी तो नवासे कितने।


चोट खाए हुए लम्हों का सितम है कि उसे,

रूह के चेहरे पे दिखते हैं मुहाँसे कितने।


सच के क़स्बे पे मियाँ झूठ की है सरदारी,

अब अटकते हैं लबों पर ही ख़ुलासे कितने।


थे बहुत ख़ास जो सर तान के चलते थे यहाँ,

अब इसी शहर में वाक़िफ़ हैं अना से कितने।


अब भी अंदर है कोई शय जो धड़कती है मियाँ,

वरना बाज़ार में बिकते हैं दिलासे कितने।


2

मुझे उम्मीद थी भेजोगे नग़्मगी फिर से।

तुम्हारे शहर से लौटी है ख़ामुशी फिर से।


यहाँ दरख़्तों के सीने पे नाम खुदते हैं।

मगर है दूर वो दस्तूर-ए-बंदगी फिर से।


गड़ी है ज़िन्दगी दिल में कँटीली यादों-सी।

ज़रा निजात मिले, तो हो ज़िंदगी फिर से।


बची जो नफ़रतों की तेज़ धूप से यारो,

ये शाख़ देखना हो जाएगी हरी फिर से।


सनम तो हो गया तब्दील एक पत्थर में,

मेरे नसीब में आई है बंदगी फिर से।


मुझे भुलाने चले थे वो भूल बैठे हैं,

उन्हीं के दर पे मैं पत्थर हूँ दायमी फिर से।

Friday, December 12, 2008

नवनीत शर्मा की पांच कविताएं

घर

भेजते रहना

पिछवाडे वाले हरसिंगार जितनी हंसी

घराल के साथ वाले अमरूद की चमक

दुनिया चाहती है तरह-तरह के सवाल रखना

शरारतों के बाद

मेरे छुपने के ठिकानों

अपना ख्‍याल रखना

2

खिड़कियों को भाने लगा है आकाश

सूरज से बिंध रही है छत

घर तब तक ही रहता है घर

जब तक उग नहीं आते

उसी में से और कई छोटे-छोटे घर

3

दरवाजे की सांकल पर

सूली चढ़ा है इंतजार

कौन है किसके पास

क्‍यारियों में हार गए फूल

जीत गया घास

4

उस परि‍चित से लगने वाले

बुजुर्ग की बेतरतीब दाढ़ी बहुत उदास करती है

जैसे मिला न हो कोई हज्‍जाम बरसों से

लोग इसे छूटा हुआ घर कहते हैं

5


यहीं से टूटता है घर

जब छोटे-छोटे उबाल

बन जाते हैं बड़े ज्‍वालामुखी